दिल्ली के मुसलमानों में कन्फ्यूजन ही कन्फ्यूजन, क्या बीजेपी को मिल गया सॉल्यूशन?

दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार का शोर सोमवार शाम थम गया है और उम्मीदवार डोर-टू डोर प्रचार कर रहे हैं. बुधवार को वोटिंग है लेकिन दिल्ली में एकमुश्त और एकतरफा वोटिंग करने वाला मुस्लिम समुदाय इस बार कशमकश में है. असदुद्दीन ओवैसी और राहुल गांधी ने जिस सियासी तेवर और अंदाज में दिल्ली चुनाव में सियासी समां बांधा है, उसके चलते मुस्लिम बहुल सीटों पर समीकरण बदल गए हैं. इसके चलते मुस्लिम मतदाता कन्फ्यूज दिख रहे हैं. सवाल उठता है कि इस कन्फ्यूजन वाली स्थिति में बीजेपी को मुस्लिम बहुल सीटों पर अपनी जीत का क्या सॉल्यूशन मिल पाएगा?

दिल्ली चुनाव में बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच कांटे का मुकाबला माना जा रहा है. ऐसे में मुस्लिम वोटर काफी अहम बन गए हैं. दिल्ली के सियासी इतिहास में यह पहला ऐसा चुनाव हो रहा है, जिसमें मुस्लिम मतदाता सियासी दलों के मुद्दे और उनके प्रत्याशियों की ओर देख रहे हैं. दिल्ली दंगों के दौरान आम आदमी पार्टी के रवैये और बदलती विचारधारा इसकी एक बड़ी वजह बनी, जिसके चलते मुस्लिम सीटों पर कांटे की टक्कर वाली स्थिति बन गई है.

दिल्ली में मुस्लिम समीकरण

दिल्ली में 13 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जिसमें 12 सीटों पर 30 से 50 फीसदी के बीच हैं. 2020 में मुसलमानों ने एकजुट होकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट किया था. इस बार AIMIM ने सिर्फ दो उम्मीदवार उतारे हैं. ओखला में शिफा उर रहमान और मुस्तफाबाद सीट पर ताहिर हुसैन को उतारा है. दोनों ही कैंडिडेट दिल्ली दंगे के आरोप में जेल में बंद हैं. कांग्रेस के सात और AAP के पांच मुस्लिम कैंडिडेट दिल्ली विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं. इस तरह बीजेपी को छोड़कर सभी दलों ने मुस्लिम बहुल सीटों पर पूरी ताकत झोंक दी है और उन्हें लुभाने के लिए हर संभव प्रयास किए हैं.

दिल्ली में मुस्लिम बनाम मुस्लिम

दिल्ली की सीलमपुर, मुस्तफाबाद, मटिया महल, बल्लीमारान और ओखला सीट पर बीजेपी को छोड़कर सभी दलों से मुस्लिम उम्मीदवार ही किस्मत आजमा रहे हैं. इन सीटों पर मुस्लिम विधायक जीतते रहे हैं. मुस्तफाबाद और ओखला सीट पर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और ओवैसी के AIMIM से मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में हैं. इसके चलते मुस्लिम बनाम मुस्लिम की सियासी बिसात बिछी है, लेकिन बीजेपी से हिंदू कैंडिडेट होने के चलते मुस्लिम मतदाताओं में कशमकश की स्थिति बन गई है.

इन पांच सीटों के अलावा बाबरपुर, गांधीनगर, सीमापुरी, चांदनी चौक, सदर बाजार, किराड़ी, जंगपुरा और करावल नगर समेत 18 सीट ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 10 से 40 फीसदी मानी जाती है. इन क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय निर्णायक भूमिका अदा करता रहा है. दिल्ली में लंबे समय तक मुस्लिम कांग्रेस का परंपरागत वोटर हुआ करता था, लेकिन 2015 और 2020 में आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोटिंग करता रहा है. इसके चलते मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस अपनी जमानत भी नहीं बचा सकी. आम आदमी पार्टी सभी मुस्लिम बहुल सीटें जीतने में सफल रही.

दिल्ली दंगे ने बदले सियासी हालत

2020 में सीएए-एनआरसी आंदोलन के चलते नॉर्थ दिल्ली में हुए दंगों के चलते मुस्लिमों का आम आदमी पार्टी से मोहभंग हुआ है. इसके अलावा कोरोना काल में तब्लीगी जमात को लेकर आम आदमी पार्टी के रवैए से भी मुस्लिमों में नाराजगी है, जिसका असर 2025 के विधानसभा चुनाव में साफ दिख रहा है. कांग्रेस के नेता और असदुद्दीन ओवैसी दिल्ली चुनाव में इन्हीं दोनों मुद्दो पर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को घेरते हुए नजर आए हैं, जिसके चलते दिल्ली के मुस्लिम इलाके में आम आदमी पार्टी के कैंडिडेट की सियासी टेंशन बढ़ गई है, लेकिन एक दांव उसके पक्ष में काम कर रहा है. इसके चलते कई सीटों पर रोचक मुकाबला बन गया है.

मुस्लिम वोटों में कन्फ्यूजन ही कन्फ्यूजन

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के पांचों मुस्लिम उम्मीदवार आमने-सामने चुनाव लड़ रहे हैं. ओवैसी के दो मुस्लिम उम्मीदवार होने के चलते दो सीटों पर तीन प्रमुख दलों से मुस्लिम हैं, जबकि बीजेपी ने इस बार किसी भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया. दिल्ली की 5 सीटों पर मुस्लिम बनाम मुस्लिम की लड़ाई है. ऐसे में मुस्लिम मतदाता किसी एक दल के पक्ष में एकतरफा वोटिंग वाली परंपरा से अलग दिख रहा. कांग्रेस और ओवैसी की घेराबंदी के चलते मुस्लिम बहुल सीटें जीतने के लिए आम आदमी पार्टी के नेताओं को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही.

मुस्लिमों के मन में एक तरफ ओवैसी के प्रत्याशियों को लेकर सहानुभूति है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए सॉफ्ट कॉर्नर नजर आ रहा है. ऐसे में बीजेपी की जीत का डर भी मुसलमानों को सता रहा है. आम आदमी पार्टी के कैंडिडेट मुस्लिम इलाकों में मुस्लिम वोटों के बंटवारे पर बीजेपी के जीत जाने की संभावना जता रहे हैं. इसके चलते मुस्लिम मतदाता कशमकश की स्थिति में हैं. मुस्लिम इलाके में राहुल गांधी को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर दिख रहा है, लेकिन जिस तरह ओवैसी की जनसभा में भीड़ जुटी है, उसके बाद स्थिति बदल गई है.

दिल्ली की सभी विधानसभा सीटों की लिस्ट यहां देखें

ओखला विधानसभा सीट के मतदाता शारिफ नवाज कहते हैं कि मेरा दिल कांग्रेस के लिए कहता है, लेकिन दिमाग आम आदमी पार्टी के लिए कह रहा है. मेरी सहानुभूति AIMIM के शिफा उर रहमान के साथ है. असदुद्दीन ओवैसी और राहुल गांधी मुसमलानों को मुद्दे पर खुलकर बोलते हैं, लेकिन केजरीवाल चुप रहते हैं. ऐसे में मेरे वोट के हकदार कांग्रेस और AIMIM है, लेकिन डर है कि कहीं बीजेपी न जीत जाए. ओखला में तीनों ही मुस्लिम कैंडिडेट मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन कौन आगे यह साफ नहीं है. इसी तरह की बातें कई दूसरे मुस्लिम मतदाता करते नजर आए, लेकिन कौन सबसे मजबूत स्थिति में कन्फ्यूज नजर आते हैं.

कन्फ्यूजन में बीजेपी का सॉल्यूशन

दिल्ली के सभी मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम मतदाता कशमकश की स्थिति में नजर आ रहे हैं. मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में ओखला और मुस्तफाबाद में AIMIM के साथ खड़े नजर आ रहे तो आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार भी मजबूती से लड़ते दिख रहे हैं. इसके तरह दोनों ही सीटों पर मुस्लिम वोट तीन जगह बंटता दिख रहा है. वहीं, मटिया महल, सीलमपुर और बल्लीमरान सीट पर मुस्लिम मतदाता आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच बंटता दिख रहा है. कन्फ्यूजन वाली स्थिति में बीजेपी के कमल खिलने का सॉल्यूशन यूपी में दिखा है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के सभी उम्मीदवारों की लिस्ट यहां देखें

बीजेपी की दिल्ली चुनाव में स्ट्रैटेजी मुस्लिम बहुल सीटों पर धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए है और उसकी कोशिश मुस्लिम वोटों के काउंटर में हिंदू वोटों को अपने पक्ष में लामबंद करने की है. ओखला और मुस्तफाबाद विधानसभा सीट पर मुस्लिम बनाम मुस्लिम की लड़ाई होती नजर आ रही है. इसके चलते बीजेपी अपनी जीत की उम्मीद लगाए हुए हैं. कांग्रेस, AAP, AIMIM के प्रत्याशी का जोर मुस्लिम वोटों को लामबंद करने का है, तो बीजेपी की रणनीति हिंदू वोटों के एकजुट करने की है. इसके चलते बीजेपी के लिए अपनी सियासी राह आसान दिख रही है क्योंकि उसे लग रहा है कि मुस्लिम वोटों में बिखराव होने पर बीजेपी के लिए जीत का समीकरण बन रहा. इसीलिए बीजेपी के दोनों ही कैंडिडेट का फोकस हिंदू समाज के वोटों पर कर रखा है.

मटिया महल और बल्लीमरान के समीकरण अलग

बल्लीमरान जैसी मटिया महल सीट के समीकरण हैं. यहां कांग्रेस और AAP के बीच जितनी मजबूती से फाइट होती, उतनी बीजेपी के लिए राह आसान होगी. बीजेपी की पूरी कोशिश धार्मिक ध्रुवीकरण करने की है, जिसमें बल्लीमारान सीट पर सियासी राह आसान हो सकती है, लेकिन सीलमपुर सीट पर कमल खिलाना आसान नहीं दिख रहा. आम आदमी पार्टी कैंडिडेट जुबैर अहमद मजबूती के साथ चुनाव लड़ते दिख रहे हैं, जबकि मटिया महल और बल्लीमरान के समीकरण अलग हैं.

दिल्ली की मस्लिम बहुल सीटों पर जिस तरह की सियासी कशमकश की स्थिति मुसलमानों में बनी है, वैसा ही एक्सपेरिमेंट यूपी की सियासत में किया जा चुका है. मुस्लिम वोटों की कशमकश का फायदा बीजेपी को मुस्लिम बहुल सीटों पर मिलता रहा है. उसी तरह का माहौल दिल्ली के चुनाव में दिख रहा है, जिसमें बीजेपी की कोशिश मुस्लिमों के बीच कन्फ्यूजन बनाए रखने की है.

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