प्रतिमा का अनादर न हो

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राष्ट्र चंडिका सिवनी ।आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को इस आस्था व मान्यता के साथ स्थापित करता है जैसे कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं। इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता।  उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि प्रेम भाव से उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है  हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, निश्चित अवधि के बाद विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना एक तरह का चलन हो गया है या फिर परिपाटी चली आ  रही है या फिर शुद्ध धन कमाने का जरिया बन  गया है।   हमारे यहां वर्षों से अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती रही है। पर सबसे ज्यादा ख्याति बंगाल की दुर्गा पूजा की और महाराष्ट्र के गणपति पूजन की ही रही है। पहले देश के किसी भी क्षेत्र का रहवासी वहीँ बने रह कर अपना जीवन व्यतीत कर देता था। बहुत कम लोग रोजगार  अपना इलाका छोड़ते थे। पर समय के साथ जब रोजगार के अवसर बढे तो जीवन-यापन, काम-धंधे के लिए विभिन्न क्षेत्रों के लोग देश के अन्य हिस्सों में जा वहाँ के लोगों के साथ अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाज, अपने तीज-त्यौहारों के साथ घुल-मिल गए। धीरे-धीरे माँ दुर्गा की पूजा, गणपति बप्पा की आराधना, राम लीला, दही मटकी लूट, कांवर यात्रा, गरबा नृत्य इत्यादि अपने-अपने क्षेत्र से निकल आए, सारी हदें ख़त्म हो गयीं। हर त्यौहार हरेक का हो सारे देश में सार्वजनिक तौर पर मनाया जाने लगा। देश के उत्सव-प्रिय लोगों को ऐसे धार्मिक मनोरंजन खूब रास आने लगे। लोगों की भीड़ बेतहाशा बढ़ने लगी। ज्यादा भीड़, ज्यादा आमदनी। लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी। पैसे के लालच ने एक ही इलाके में दसियों पंडालों को खड़ा कर दिया। मेले-ठेलों की भरमार हो गयी। स्पर्द्धा ने आयोजनों को भव्य बनाने की होड़ मचा दी। लोगों को आकर्षित करने के नए-नए रास्ते अपनाए जाने लगे। प्रतिमाएं गौण हो गयीं, पंडालों और अन्य विधाओं पर करोड़ों खर्च होने लगे। आकर्षण बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े कलाकारों को जिनकी फीस ही करोड़ों में होती है, बुलाया जाने लगा। अध्यक्ष पद के लिए रसूखदार लोगों का आह्वान होने लगा। पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव हाशिए पर चले गए, दिखावा, शोर-शराबा अन्य बुराइयों के साथ हावी हो गए। धीरे-धीरे यहां ऐसे लोगों की पैठ होती चली गयी जिनका आस्था, संस्कृति, धर्म, पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव से कुछ लेना-देना नहीं था उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, पैसा।
एक तरफ आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को स्थापित कर पूरे मनोयोग से अपनी हैसियत के अनुसार यथासाध्य विधि पूर्वक पूजता है। उसकी आस्था व मान्यता होती है कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं। इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता। उसे ऐसा  लगता है जैसे उसके घर का कोई प्रिय सदस्य दूर जा रहा हो। उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है। नदी, तालाब,  में उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है।