सोनिया गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष पद पर वापसी, राह नहीं आसान

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नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में सोनिया गांधी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैंं। उन्होंने 1998 से लेकर 2017 लगातार 19 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाला और 2017 में उन्होंने इसकी जिम्मेदारी राहुल गांधी को सौंप दी। लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी ने अपने पद सेे इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद शनिवार को हुई कांग्रेस सीडब्ल्यूसी की बैठक में सोनिया गांधी को फिर से पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुना गया।
कांग्रेस के 132 साल के इतिहास में सोनिया गांधी के नाम पर सर्वाधिक समय तक पार्टी के नेतृत्व करने का रिकॉर्ड है। उनके अध्‍यक्ष रहते हुए पार्टी ने लगातार दो बार साल 2004 और 2009 में लोकसभा चुनाव जीत कर सहयोगी दलों के साथ मिलकर केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई। वर्ष 1946 में इटली में जन्‍म लेने वाली सोनिया गांधी का भारत में राजनीतिक सफर किसी बॉलीवुड फिल्‍म की से कम नहीं रहा है।

आइए जानते हैं सोनिया के सफर के बारे में कैसे संभाली उन्होंने कांग्रेस की कमान।

सोनिया गांधी का राजनीतिक सफर
सोनिया गांधी कभी भी राजनीति में कभी भी नहीं आना चाहती थी। लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद 1998 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सोनिया को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। इससे पहले उन्‍होंने ने पार्टी से दूरी बनाए रखी। यह वह दौर था, जब कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान हुआ था। सालों बाद वह 1997 में सक्रिय राजनीति से जुड़ने को लेकर खुद को मना पाईं।

सोनिया 1998 में बनी थीं कांग्रेस अध्‍यक्ष

सोनिया गांधी (72) साल 1998 में कांग्रेस अध्‍यक्ष चुनी गई थीं और 19 साल बाद साल 2017 में उन्‍होंने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अध्यक्ष पद छोड़ने का फैसला किया और अपने बेटे राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी। राहुल को साल 2013 में कांग्रेस का उपाध्‍यक्ष बनाया गया था। उनके नेतृत्‍व में कांग्रेस के संगठनात्‍मक ढांचे और भविष्‍य को लेकर पार्टी की रणनीतियों में बड़े फेरबदल की उम्‍मीद की जा रही थी, लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला।

प्राथमिक सदस्यता के 62 दिनों के भीतर बनीं कांग्रेस अध्यक्ष
शुरुआती अनिच्‍छाओं के बावजूद पार्टी की प्राथमिक सदस्‍यता लेने के 62 दिनों के भीतर वह कांग्रेस की अध्‍यक्ष बन गईं। हालांकि यह उनके लिए इतना आसान नहीं था और उनका विदेशी मूल का होना एक बड़ा मुद्दा बन गया। इसी के चलते 2004 और 2009 आम चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिलने के बाद भी वो प्रधानमंत्री नहीं बन पाई थी। विदेशी होना उनके लिए एक बड़ी चुनौती साबित हुई, हालांकि इसके बाद भी उनके हौंसलों में कोई कमी नहीं आई। उनके नेतृत्‍व में कांग्रेस ने साल 2004 का आम चुनाव जीता और घटक दलों के साथ मिलकर यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सरकार बनाई।

मनमोहन सिंह को बनाया प्रधानमंत्री 

सोनिया जानती थी कि उनके विदेशी होने के कारण विपक्ष समय समय पर उनपर हमला करता रहेगा। इसलिए उन्होंने खुद प्रधानमंत्री ना बनकर कुछ ऐसा फैसला किया कि वह कांग्रेस पर अपनी पकड़ कायम रख सकें। उन्होंने पूर्व वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया।

UPA सरकार में भी रही अहम भूमिका 
सोनिया ने कांग्रेस के लिए जो योगदान दिया है उससे नकारा नहीं जा सकता। कांग्रेस के कई नेता भी मानते हैं कि उनके प्रयासों की बदौलत ही पार्टी को एक बार फिर उठ खड़ा होने में मदद मिली। सोनिया ने पार्टी को संभालने के साथ साथ UPA की अध्‍यक्ष के तौर पर सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को मूर्त रूप देने में भी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई।

फोर्ब्‍स पत्रिका ने घोषित किया सबसे सशक्त ​महिला

सोनिया के ही नेतृत्‍व में कांग्रेस ने 2009 का आम चुनाव जीता और पार्टी को इस चुनाव में 206 सीटें मिलीं, जो साल 1991 के बाद पार्टी को मिली सर्वाधिक सीट थी। उसी साल फोर्ब्‍स पत्रिका ने उन्‍हें सबसे सशक्‍त महिला नेता घोषित किया। उनके नेतृत्‍व की भी सराहना हुई, जिसमें कांग्रेस दिन प्रतिदिन सफलता हासिल कर रही थी।

पार्टी पर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
इसी बीच पार्टी ने सोनिया गांधी के नेतृत्‍व में ढलान भी देखा। कांग्रेस नेताओं और UPA सरकार के कई मंत्रियों पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगे, जिससे पार्टी को कई आरोपों का सामना करना पड़ा और इसके दाग सोनिया के दामन तक भी पहुंचे। नरेंद्र मोदी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने उनका नाम देश के सबसे बड़े 2 जी घोटाले से जोड़ा। सोनिया के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर कई देशों में जमीन खरीदने के आरोप लगे और कहा गया कि सोनिया ने इसमें मदद दी। उनका नाम अरबों डॉलर के अगस्‍ता वेस्‍टलैंड घोटाले में भी जोड़ा गया। हालांकि उन पर लगा कोई भी आरोप कोर्ट में साबित नहीं हो पाया।
वंशवाद का लगा आरोप

सोनिया ने अपने कार्यकाल में कई आरोपों का सामना किया उनमें से एक है वंशवाद को बढ़ावा देना। उन पर विपक्ष ने आरोप लगाए की वो राजनीतिक वंशवाद को बढ़ावा देती है। इसके बाद से ही कांग्रेस ऐसे विवादों में पढ़ी की कांग्रेस का आधार सिमटता गया।

बहरहाल सोनिया गांधी को फिर से कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया है लेकिन इस बार उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कई पुराने कांग्रेसी नेता पार्टी को छोड़ रहे हैं,कई राज्यों में अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पाया है। सोनिया गांधी के लिए बहुत बड़ी चुनौती पार्टी को फिर एकजुट करना और संगठन को मजबूत करना होगा। इसी साल चार राज्यों, महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और दिल्ली में विधानसभा चुनाव भी होने हैं। इन चुनावों में भी सोनिया गांधी की अग्निपरीक्षा होने वाली है।