पहला गांव जहां विधवा प्रथा पर लगा बैन, पहले बुजुर्गों ने किया था विरोध बाद में माने

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Maharashtra News: इन प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने की शुरुआत कोल्हापुर जिले के हेरवाड गांव से हुई, लेकिन गांव ने सिर्फ इसको लेकर प्रस्ताव पारित किया था.

Udachiwadi village ban on regressive widow customs: कोल्हापुर जिले का हेरवाड गांव तो आपको याद ही होगा. लगभग दो सप्ताह पहले गांव ने विधवाओं से संबंधित अंतिम संस्कार प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव पारित किया था, ऐसा करने वाला वह राज्य का पहला गांव बना था. प्रस्ताव के पारित होने के बाद राज्य सरकार ने सभी गांवों को इसका अनुकरण करने को कहा था. सरकार के निर्देश का पालन करते हुए पुणे जिले के पुरंदर तालुका का उदाचिवाड़ी गांव राज्य का पहला गांव बन गया है, जिसने वास्तव में इस तरह के रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लागू करना शुरू किया है.

उदाचिवाड़ी गांव ने कायम की मिसाल

गुरुवार को ग्राम सभा में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसके बाद इस बात का संकेत देते हुए कि गांव में अब इस तरह की प्रथाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, कुछ विधवाओं के माथे पर सिंदूर लगाया गया. पुणे जिला परिषद के सीईओ आयुष प्रसाद ने गुरुवार शाम को इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हालांकि हेरवाड और मानगांव गांवों ने विधवाओं से संबंधित संस्कारों पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन उदाचिवाड़ी वास्तव में इन रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगाने और इसे लागू करने वाला महाराष्ट्र का पहला गांव बन गया है.”

ग्रामवासियों ने सर्वसम्मति से लिया फैसलाउन्होंने कहा कि यह एक साहसिक कदम है और मैं ग्रामीणों को एक अद्वितीय उदाहरण स्थापित करने के लिए बधाई देता हूं. यह कदम विधवाओं के मनोबल को ऊपर उठाने में मील का पत्थर साबित होगा.बता दें कि इस महीने की शुरुआत में कोल्हापुर जिले के हेरवाड गांव और मनगांव गांव ने विधवाओं से जुड़े अंतिम संस्कार के रीति-रिवाजों जैसे सिंदूर को पोंछने और उनकी चूड़ियां तोड़ने पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया था. वहीं, उदाचिवाड़ी गांव में गुरुवार की सुबह 100 से अधिक ग्रामवासियों ने ग्राम सभा में भाग लिया जहां इस तरह के रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया.

पहले गांव के बुजुर्ग नहीं थे राजी

इस मौके पर गांव के सरपंच संतोष कुंभारकर ने कहा कि  ‘इस प्रस्ताव को ग्राम सभा के सामने लाने से पहले हमने गांव में जागरूकता अभियान चलाया था. हमने ग्रामीणोंं को कोल्हापुर में इस संबंध में पारित प्रस्ताव और सरकार के निर्देशों के बारे में बताया. गांव के युवाओं ने तो इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई लेकिन बुजुर्ग इसके समर्थन में नहीं थे. लेकिन बाद में, वे भी मान गए और इस बात पर सहमत हुए कि हमें अपनी महिलाओं को सदियों पुरानी प्रथाओं के बंधन से मुक्त करना चाहिए.